Garmi ki Chuttiyan!
गर्मी की छुट्टी में कही कोई *समर कैंप* नहीं होते थे, पुरानी चादर से छत के कोने पर ही टेंट बना लेते थे , क्या ज़माना था जब ऊंगली से लकीर खींच बंटवारा हो जाता था, लोटा पानी खेल कर ही घर परिवार की परिभाषा सीख लेते थे। *मामा , मासी , बुआ, चाचा के बच्चे सब सगे भाई लगते थे, कज़िन क्या बला होती है कुछ पता नही था।* घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था. *कंचे, गोटियों, इमली के चियो से खजाने भरे जाते थे,* कान की गर्मी से वज़ीर , चोर पकड़ लाते थे, *सांप सीढ़ी गिरना और संभलना सिखलाता था*, *कैरम घर की रानी की अहमियत बतलाता था,* घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था. *पुरानी पोलिश की डिब्बी तराजू बन जाती थी ,* नीम की निंबोली आम बनकर बिकती थी , बिना किसी ज़द्दोज़हद के नाप तोल सीख लेते थे , साथ साथ छोटों को भी हिसाब -किताब सिखा देते थे , *माचिस की डिब्बी से सोफा सेट बनाया जाता था ,* पुराने बल्ब में मनीप्लान्ट भी सजाया जाता था , घर छोटा ही सही पर प्यार से गुजारा हो जाता था. *कापी के खाली पन्नों से रफ बुक बनाई जाती थी,* *बची हुई कतरन से गुडिया सजाई जाती थी ,* *रात में दादी-नानी ...